गीत फरोश" कविता पे चिंतन

 INSTITUTE OF LANGUAGE TEACHING B.ED COLLEGE RAJKOT 

NAME :- DABHI MONTU 

ROLL NO :- 04

 ENROLLMENT NUMBER :- 221480030029


"गीत फरोश" भवानी प्रसाद मिश्र की कविता पे चिंतन

इस कविता में कवि कहना चाहते है कि मैं आज ऐसी विपिन स्थिति में पहुंच गया हूं कि, मुझे अपने करीने से सजाए शब्दों के उपवन के गीतों को बेचना पड़ रहा है। मैं अपनी कलम बेचने में यकीन नहीं करता पर परिस्थितियां ही इतनी त्रासद है कि मुझे अपनी कलम बेचने पर मजबूर होना पड़ रहा है। कवि स्पष्ट कर रहा है कि उन्हें किन परिस्थितियों के कारण गीत बेचना पड़ रहा है, और उन लोगों को स्पष्ट कर देना चाहता है कि वह किसी शौक के लिए इस कार्य को नहीं कर रहे हैं बल्कि वह मजबूरी में इस कार्य को करना पड़ रहा है।


              आगे कहते है की मेरे पास गीतों का अथाह भंडार है आप जरा गीत पसंद कीजिए, जो भी गीत उठाएंगे उसी गीत का कोई ना कोई अर्थ होगा। वह निरर्थक नहीं होगा यह मेरे गीत आपके किसी ना किसी काम आ जाएंगे आपके सुख और दुख हो किसी भी प्रकार का वातावरण हो उसके अनुकूल उसकी परिस्थितियों के अनुकूल यह गीत आपको मिल जाएगी यह गीत निरर्थक नहीं है। सभी का कोई न कोई अर्थ है कोई न कोई काम है। अगर आपको मेरे गीत नहीं पसंद आते विशेषता नहीं पता तो मैं बता दूंगा मेरा हर गीत काम का है। कवि इन पंक्तियों में स्पष्ट और सरल भाषा में यह कहना चाहते हैं कि यह मेरे गीत किसी न किसी कार्य के लिए हैं यह निरर्थक नहीं है।


                    कवि गीत को स्वानुभूति है, और कोई भी व्यक्ति अपनी अनुभूति का सौदा नहीं करता । यदि कोई ऐसा करता है तो वह अत्यंत लज्जाजनक और हास्यास्पद है। इसलिए कवि को भी गीत बेचने में शर्म आ रही थी किंतु अब इसका महत्व समझ चुके है । गीत बेचकर ही कवि की विपन्नता दूर हो सकती है। यदि इस कारण कवि का भविष्य सुधर सकता है और उनकी आजीविका चल सकती है तो फिर शर्म किस बात की। कवि सोचते है कि लोग तो अपने ईमान तक बेच देते हैं मैं तो यह गीत भेज रहा हूं यदि कलाकार गीत बेचकर धनार्जन करता है तो इसमें कोई बुराई नहीं मैं तो अपनी मेहनत से ही बेच रहा हूं वरना आज तो संसार के लोग स्वार्थ की पूर्ति के लिए सब कुछ बेच देते हैं ।

  

                    कवि ग्राहक को अपने माल का बखान कर रहा है और ग्राहक को यह बताने का काम कर रहा है कि इस गीत को गाकर देखें यह आपके किस समय के लिए है यह आप इसको चेक कर सकते हैं सुबह का गीत है शाम का गीत है सुख का है दुख का है भूख बढ़ाने वाला है भूख जगाने वाला है यानी कि हर एक प्रकार का गीत है इस तरह श्रीमान मेरे पास अनेक गीत है जो गीत अभी तक दिखाएं हैं उनमें से पसंद नहीं आया है तो मेरे पास और भी गहरे उन्हें भी दिखाता हूं हो सकता है उन गीतों में से कुछ पसंद आ जाए और आपके मन की इच्छा के अनुसार गीत मिल जाए।


      कवि कहते है कि मैंने बहुत सोच समझकर अपने गीत बेचने का निर्णय लिया आज तो व्यक्ति अपने ईमान तक को बेच देते हैं आदिकाल से लेकर छायावाद काव्यपरंपरा तक जितने भी जैसे भी गीत लिखे गए हैं उन सभी गीतों के समान मैं भी लिख सकता हूं तो श्रीमान अब तो आपकी मर्जी पर निर्भर है। आप कैसा गीत पसंद करते हैं आप कैसा यह खरीदना चाहते हैं मेरे पास अक्षय गीत को सहने लिखे का हर तरह आपके आदेश की दरकार है। तत्काल आपके समक्ष गीत पेश कर सकता हूं, बल्कि आप को आपके सामने ही लिख कर दे सकता हूं। 


      कवि आगे कहते है कि आपको कोई गीत पसंद नहीं आया तो कोई बात नहीं आपकी मर्जी है। आप कैसा चीज पसंद करना चाहते हैं किंतु एक बात अवश्य बताना चाहता हूं कि मैं आपकी पसंद का गीत में लिख सकता हूं मैंने तो अपना माल दिखा दिया है। अब आपकी मर्जी ठहरिए उठकर मत जाइए मैं आपको अपना आखिरी गीत दिखाता हूं इसके बाद आपको कोईगीत नहीं दिखाऊंगा। जिस प्रकार एक साधारण फेरीवाला अपने सामान का सौदा करता है तरह तरह से उसके गुण बताता है और उसका व्यापार करता है। ठीक उसी प्रकार भवानी जी अपनी कविता का व्यापार कर रहे हैं। जब वह अपनी विषम परिस्थितियों से लाचार हो जाते है तो उनको गीत बेचना पड़ता हैं। वस्तुतः देश की वर्तमान विषम अर्थव्यवस्था और कवि की अनुभूति के प्रति सामान्य सिस्टर रुचि की उदासीनता का चित्रण कवि ने इस कविता में किया है।


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